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हाँ में एक अल्पसंख्यक हूँ और मुझे भी लगता है डर

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हाँ मैं एक अल्पसंख्यक हूँ और मुझे भी लगता है डर !

निवर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने  कार्यकाल पूरा होने के अवसर पर जो अपना ख्याल बयान किया वह बिलकुल भी चोकाने वाला नहीं है. यह एक सच्चाई है. जिसे स्वीकार नहीं करने का मतलब देश को अँधेरे में ले जाने जैसा है. इस डर को नहीं समझ पाना या समझ भी गए तो अनदेखा कर देना सीधे तौर पर लोकतंत्र की हत्या है.

उन्होंने कहा की देश में अल्पसंख्यक डरा हुआ है.

देश के मुस्लिमों में बेचैनी का अहसास और असुरक्षा की भावना है. स्वीकार्यता का माहौल खतरे में है. यह बात निवर्तमान उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कही है. उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जब असहनशीलता और कथित गौरक्षकों की गुंडागर्दी की घटनाएं सामने आई हैं और कुछ भगवा नेताओं की ओर से अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ बयान दिए गए हैं.

निवर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद हंसारी जी देश में बढ़ रही असहिष्णुता पर चिंता व्यक्त की. उन्हने अपने बयान में कहा की

“मैं आज पूर्व राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन के वही शब्द दोहराना चाहता हूँ जो मैंने 2012 में कहे थे. एक लोकतंत्र की पहचान इस बात से होती है कि वो अपने अल्पसंख्यकों को कितनी सुरक्षा दे सकती है. साथ ही किसी लोकतंत्र में अगर विपक्ष को सरकारी नीतियों की समीक्षा या आलोचना करने का अधिकार नहीं मिलता तब वो तानाशाही में तब्दील हो जाती है”.

निवर्तमान उपराष्ट्रपति जी को देश हालिया माहोल का बड़ा ही दुःख रहा होगा. तभी उन्होंने ऐसे विचार रखे, abchindipost के एडिटर होने के नाते मुझे हामिद अंसारी साहब के बयानों में सच्चाई का अहसास होता है. एक संवेधानिक पद पर रहने वाला अधिकारी जब देश में बढती असहिष्णुता का डर अपने दिल में रख सकता है, तो आम अल्पसंख्यकों के डर का क्या आलम होगा यह सोच कर देखना चाहिए. उनके इस विचार को रूलिंग party के नेताओं ने राजनीती से प्रेरित बताया और कहा की देश में ऐसा कोई माहोल नहीं है. किन्तु इस आर्टिकल के माध्यम से में हामिद अंसारी साहब की चिंता को समझ सकता हूँ. उन्होंने सरकार की योजनाओ और कार्यशैली का जायजा लेकर उपरोक्त बात कही है. बीजेपी के मंत्रियों ने हामिद साहब के बयान को राजनितिक बयां बताया . 

लेकिन वास्तविकता यही है जो हामिद साहब ने कही| मैं उनके बयां से सहमत हूँ. और इस बात को निचे कुछ विस्तारित रूप दे रहा हूँ. ताकि बात समझ आ सकते.

हाँ में एक अल्पसंख्यक हूँ और मुझे भी डर लगता है. मैं देश के राष्ट्रपति से, देश के प्रधान मंत्री से, देश के राजनेताओ, बुद्धिजीवियों, लेखकों, सरकारों और प्रशाशनिक अधिकारीयों और देश की जनता से कहना चाहता हूँ कि मैं एक अल्पसंख्यक हूँ और मुझे भी डर लगता है,

  • मुझे उस वक़्त डर का अहसास होता है, जब में सड़क पर जा रहा हूँ और भगवा रंग वाले लोगों को देखता हूँ. मुझे लगता है. कही ऐसा न हो जाए की यह लोग सड़क पर चलते हुए मुझसे किसी बात पर झगडा न करने लगे. झगडा हो जाने तक तो ठीक है. लेकिन कहीं यह मेरी जान न ले लें,
  • मैं  डरता हूँ इसलिए जब भी कभी किसी ट्रेन में सफ़र करता हूँ तो पहले यह देखता हूँ की यहाँ पर किस प्रकार के लोग बैठे हुए है. कहीं इनमे से कोई मुझे पाकिस्तानी या आतंकवादी होने का तोहमत तो नहीं लगा देगा और मेरा हाल उत्तरप्रदेश के जुनैद जैसा तो नहीं कर देगा.
  • आम तौर पर हर कोई किसी सुनसान जगह पर अकेले होने पर डर महसूस करता है. अकेले में जब कोई और इंसान दिखाई दे जाता है तो वोह थोडा सुरक्षित महसूस करता है. लेकिन अब समय बदल गया है अब तो  भीड़ से भी डर लगता है. इसी भीड़ का तांडव मैंने अलवर में पहलू खान के साथ देखा, इसी  भीड़ का तांडव मैंने ट्रेन में जुनैद के साथ देखा, इसी  भीड़ का तांडव मैंने कश्मीर के जम्मू में देखा और न जाने कितनी ही ऐसी घटनाएं है. जहाँ मैंने भीड़ का तांडव देखा. तो अब तो अकेले में नहीं भीड़ में डर लगता है.
  • मुझे उस वक़्त डर का अहसास हुआ जब में सड़क की फूटपाथ पर बने एक छोटे से मंदिर की बगल से गुजर रहा था. और तबियत ख़राब होने की वज़ह से मुझे उलटी आ गयी. मैं उसे रोक न सका और वोह मेरे मुह से मंदिर थोड़ी दूरी पर निकल गयी. तब मुझे लगा की अगर यहाँ किसी ने मुझे देख लिया होता तो पता नहीं क्या होता.
  • मुझे उस वक़्त डर लगता है. जब में बाज़ार से कोई सब्जी लेकर घर आता हूँ, तो मुझे डर लगता है. कोई मेरा सब्जी का थैला चेक करके इसमें गौमास न बता दे, चाहे उस थैले में आलू और टिंडे ही क्यूं न हो. राजनितिक फायदा उठाने के लिए लोग मेरे आलू, टिंडे के थैले में जबरन कोई मांस का टुकड़ा न रख दें और उसे गौमांस बताकर बवाल खड़ा न कर दें.
  • मुझे उस वक़्त डर लगा था जब मैं अपने बेटे के लिए एक अच्छा सा कोचिंग सेण्टर देख रहा था. उस कोचिंग सेण्टर में एक भी अल्पसंख्यक बच्चा नहीं पड़ता था. तो मुझे डर लगा मैं अपने बेटे को ऐसे अकेले यहाँ कैसे भेजूंगा. कही किसी ने किसी बात पर इससे कहा सुनी कर ली तो यह लोग तो कोई भी इलज़ाम लगा कर अभद्र धार्मिक टिप्पणियां भी न कर दें. और उसको कोई नुक्सान न पंहुचा दें. आज भी में इस बात के डर को लेकर जीता हूँ.
  • बहूत सी जगह ऐसा महसूस होता है की यहाँ अपनी धार्मिक पहचान chहुपाई जानी चाहिए वरना प्रताड़ित होना पड़ सकता है.
  • रमजान में रोज़ा रखने में डर लगता है की कहीं. देश को चलाने वाले बड़े बड़े नेता जबरदस्ती मेरे मूंह में रोटी न ठूंस दें. जैसा संसद के कैंटीन में हुआ था.

सरकारों को यह डर शायद नज़र न आये, मगर देश का हर अल्पसंख्यक किसी न किस डर को अपने दिल में रख कर जीता है. देश के किसी भी समुदाय, जाती, धर्म अथवा सम्प्रदाय के लोगों में किसी भी प्रकार का डर पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है. इस प्रकार मोजूद डर के रहते हुए कभी भी भारत के स्वर्णिम भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती. और न ही डरे huye लोग देश निर्माण में अपना पूरा सहयोग दे पाते है.

देश में इंसानों के साथ पशुओं के नाम पर पशुओं से भी बुरा हाल किया जा रहा, सरकार को जिनकी ज़बान नहीं उनका दुःख नज़र आ जाता है. किन्तु जो इंसान अपनी जुबां से चीख चींख कर अपनी सुरक्षा की बात करता है तो वोह आवाज़ नहीं सुनाई देती.

और यह दर केवल अल्पसंख्यकों में ही नहीं है. बल्कि देश की हर अमीर गरीब जनता में है. यह डर उसे सताता है. कही कोई अप्रिय घटना न घटित हो जाए, महिलाओं को डर सताता है की कोई मंत्री का बेटा, कोई रिश्तेदार किसी महिला के साथ दरिंदगी न कर दे. यहाँ तक की मासूम बच्चियों को नहीं बक्शा जाता.

देश की जनता के दिल में मौजूद डर को नहीं मिटाया गया तो भारत कैसे विश्व शक्ति और विश्वगुरु बनेगा.

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