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Lipstick Under My Burkha- भारत में रिलीज़ नहीं कर सकते – Censor Board

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Lipstick Under My Burkha:

Lipstick Under My Burkha- सेंसर बोर्ड के अनुसार यह फिल्म भारत में रिलीज़ नहीं कर सकते | सेंसर बोर्ड ने प्रकाश झा की फिल्म लिपिस्टिक अंडर बुरका को कोई भी सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया है. सेंसर बोर्ड का तर्क है की यह फिल्म बाकी फिल्मो से इतनी ज्यादा अलग है की इसके लिए सेंसर बोर्ड के पास किसी प्रकार का कोई सर्टिफिकेट नहीं है. एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में पहलाज निहलानी ने यह बात बताई |

क्या है Lipstick Under My Burkha फिल्म में जिससे अनुमति नहीं दी जा सकती ? जब हमने इसकी पड़ताल की तो हमने सेंसर बोर्ड के तर्क को सही पाया. आइये जानते है क्या वज़ह रही जिसके कारण इस फिल्म के प्रदर्शन पर भारत में मोहर नहीं लगाई जा सकती.

1. Lipstick Under My Burkha कहानी : सेंसर बोर्ड के अनुसार फिल्म में कई द्रश्य अश्लील तो है ही किन्तु वोह इस प्रकार से प्रदर्शित है जो भारतीय समाज और सामाजिक मान्यताओं के बिलकुल विपरीत है. जो भारतीय समाज में एक गलत सन्देश देते है. एक प्रकार से इस प्रकार की फूहड़ता है जिससे भारतीय समाज की मर्यादाओं का उलंघन होता है.

2. बुरका के कारण : बताया जा रहा है की लिपिस्टिक अंडर माय बुरका टायटल भारत में रह रहे एक ख़ास धर्म के, ख़ास पहनावे को गलत ढंग से प्रस्तुत करती है. फिल्म में बताया गया की भोपाल में रह रही कुछ महिलाएं. जीवन को अपने ढंग से जीने के लिए बुरका का गलत ढंग से इस्तेमाल करती है. और असामाजिक शारीरिक सम्बन्ध बनाती है जो की बुरका प्रथा के बिलकुल विपरीत है इससे देश में रह रहे भारतीय मुस्लिम समाज में रोष व्याप्त होगा और इससे सांप्रदायिक भावनाएं भड़क सकती है.

3. Lipstick Under My Burkha डायलोग : फिल्म के डायलोग अत्यधिक अश्लील है, गाली गलोच है, कुछ डायलोग इस प्रकार है जिनको सभ्य समाज कभी नहीं सुनना चाहता. जो समाज में अश्लीलता फैला सकते है और हमारा सामाजिक संवाद शालीनता से अश्लीलत की ओर अग्रसर हो सकता है.
4. Lipstick Under My Burkha में भारतीय महिलाओं की भूमिका का गलत चित्रण : भारतीय समाज में ज्यादातर महिलाएं चाहे किसी भी धर्म से आती हो. वह सामाजिक द्रष्टिकोण से हमेशा पवित्रता का नमूना रही है है. भारतीय महिलायों के चरित्र को गलत प्रकार से प्रस्तुतीकरण भी फिल्म पर मोहर नहीं लगने का एक मुख्य कारण है. जिसके कारण भारतीय महिलाओं की मर्यादाओ को ठेस पहुचाता है.

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भारत में कुछ लोग जिनकी मानसिकता बिगड़ी हुई है. वोह अपने आर्थिक फायदे के लिए समाज के ऐसे विषयों पर अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते है जो हमारे स्वच्छ समाज और हमारी भावनाओं को नुक्सान पहुचाती रहती है. आये दिन ऐसी खबरें आती रहती है पिछले कुछ दिनों पहले ही राजस्थान में संजय लीला भंसाली को इसलिए मार पड़ी की उन्होंने राजपूत समाज की भावनाओ को ध्यान में न रखकर एक इतिहासिक किरदार को अपने आर्थिक फायदे के लिए इस प्रकार प्रस्तुत करने की कोशिश की जिसकी इतिहास में कोई जगह ही नहीं है. रानी पद्मावती के किरदार को संजय लीला भंसाली एक प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत करना चाहते है. जिससे दर्शक फिल्म रिलीज़ होने पर अपनी जेब ढीली कर संजय लीला भंसाली का बैंक बैलेंस बड़ा सके.

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर समाज ऐसी फिल्मे या कार्यक्रम नहीं बनाये जाने चाहिए जिससे हमारा सामाजिक तानाबाना ही बिगड़ जाए और उसको गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाए.

अभिव्यक्ति की आजादी कैसी हो ?

भारतीय संविधान में हर भारतीय को अपने विचार रखने की आजादी है. किन्तु यह कैसे आजादी चाहते है लोग की नग्नता और अश्लीलता परोसी जाए. क्या समाज में सिर्फ यही अभिव्यक्ति का विषय रह गया है. क्या हमारे देश और समाज में और कोई ऐसी विषय नहीं है जिन पर फिल्म निर्माण किया जा सके.

क्या हम अश्लीलता को छोड़ कर एक स्वच्छ समाज के निर्माण हेतु अपनी अभिव्यक्ति पेश नहीं कर सकते है.

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Update : यह फिल्म आखिर कार जुलाई में  भारत में रिलीज़ हो चुकी है और महिलाओं को यह फिल्म बहूत पसंद भी आ रही है.

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