ताजमहल का इतिहास आज कितना झूठा या सच्चा – History of Tajmahal

ताजमहल का इतिहास : ताजमहल दुनिया की एक अज़िमुस्शान ईमारत, एक ऐसी ईमारत जो इस दुनिया के अचंभो और अजूबो में शामिल है, देश विदेश से हज़ारों विदेशी हजारों किलोमीटर का सफ़र कर के लोग इस ईमारत को देखने भर आते है. क्यूं ?

वैसे तो ये ताजमहल मुहब्बत की निशानी के तौर पर भी जाना जाना जाता है लेकिन आज कल इसका इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए किया जा रहा है. बात साफ़ है की राजनीति करने वाले लोग अपने फायदे के लिए जब अपने माँ बाप को नहीं बक्शते तो यह तो एक निर्जीव ईमारत है. नेता अपनी गद्दी को बचाए रखने के लिए और बेवक़ूफ़ लोगो को अपने शिकंजे में जकड़ने के लिए हर जायज़ और नाजायज़ हथकंडो को इस्तेमाल करते है. यही सियासत है.

किसी की मोहब्बत की निशानी ताजमहल आजकल राजनीती का शिकार है. सियासत दान आजकल इस मुहब्बत की निशानी के ज़रिये नफरत फैलाने का काम कर रहे है. वाकई में उनकी हिम्मत की दाद देता हूँ. जिन्होंने यह बीड़ा उठाया है की मोहब्बत से नफरत कैसे फैलाई जाये

ताज्जुब की बात यह है की यह नेता मुहब्बत के ज़रिये मुहब्बत का इस्तेमाल करके नफरत फैलाने में कामयाब हो रहे है. कारण साफ़ है धर्म, जात और समुदाय के नाम पर बड़ी से बड़ी पाक साफ़ मुहब्बत को दबाया और कुचला जा सकता है. इसका साफ़ साफ़ उदाहरण हमारे देश में देखा जा सकता है. जिस ताजमहल पर जाकर लोग अपनी मुहब्बत को परवान चढ़ते महसूस करते थे वहां से आजकल नफरत भी साफ़ आ रही है. और इस नफरत का दायरा इतना बड़ा है की यह भारत देश तो क्या पूरी दुनिया को अपनी आगोश में ले रहा है.

हमने आजतक यही जाना, समझा और महसूस किया है की ताजमहल हमारे देश की शान है, दुनिया के अजूबो में इसका भी नाम है. यह एक राजा के अपनी रानी के प्रति प्यार की निशानी है. जिसे शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज की मौत के बाद उसकी याद में बनवाया था.

यह जमाना सदियों से मुहब्बत को दुश्मन है, चाहे वोह मुहब्बत आदिकाल में की गयी हो या आजके आधुनिक काल में हमेशा से मुहब्बत को ज़माने ने नाकारा है. जब एक प्रेमी और प्रेमिका आपस में प्रेम करते है तो उन्हें जमाना कभी पसंद नहीं करता पहले भी आज भी |

लेकिन ताजमहल वाले मामले में जमाना एक नहीं बल्कि कई कदम आगे निकल गया वो इसलिए की प्यार करने वाले अब इस दुनिय में नहीं है फिर भी ज़माना उनके खिलाफ खड़ा हो रहा है और उनके खिलाफ लोगो को भड़का कर नफरत पैदा कर रहा है.

हम जिन सियासत दानो को अपनी भलाई के चुनते है. इस उम्मीद में की हमारा इतिहास चाहे जैसा भी रहा हो लेकिन हमारा भविष्य अच्छा होना चाहिए, हम सबको अपने भविष्य की ही चिंता रहती है मगर हमारे नेता हमें वापिस इतिहास में ले जाना चाहते है. जबकि हमें जाना आगे है. हमारे नेता हमें उस इतिहास की दुहाईया दे रहे है जिसका वो कभी हिस्सा नहीं रहे. साफ़ शब्दों में कहा जाए तो उन्हें इतिहास की जानकारी ही नहीं मगर वो इस पर राजनीति तो कर ही रहे है.

ताजमहल पर राजनीती करने से हमें तो कोई फायदा नहीं होने वाला किन्तु उन्हें ज़रूर इसका फायदा हो रहा है. वो ऐसे संवेदन शील मुद्दों को भड़का कर एक खास लोगो की भीड़ को एक करने में कामयाब हो जायेंगे जो उनके लिए वोट बैंक का काम करेगी, जिसको जरिया बनाकर वो और कुछ साल देश पर राज करेंगे और अपनी झोलियाँ भर लेंगे. उनकी झोलियाँ तो भर जाएँगी. मगर हम आम लोग वैसे ही रह जायेंगे और हमारी चिंता फिर से वही रहेगी की हमारा भविष्य कैसे सुरक्षित हो.

सियासत दान हमें यह कहकर भड़का रहे है की हमारा इतिहास बदल दिया गया है. और उसे वोह बदलना चाहते है. दरअसल इतिहास पहले नहीं बदला है इतिहास को आज बदलने की कोशिश की जा रही है. और कुछ हद तक यह लोग कामयाब भी  हो रहे है. मगर यह जानना ज़रूरी है की इतिहास बदल देने से हमारा भविष्य कैसे सुरक्षित होगा. जनता और लोगो की मूलभूत सुविधाओं को इतिहास बदल कर कैसे बढाया जा सकता है. जो समय गुजर चूका हो उसको तब्दील करके विकास कैसे हो सकता है यह हमारी समझ से परे है.

ताजमहल पर भले ही आजकल के नेता कुछ भी विवादित बयान देते रहे मगर हकीकत नहीं बदल सकती. दरअसल यह नेता जिन्होंने हमसे विकास का वादा लेकर वोट लिया, किन्तु ये विकास नहीं कर सके इसलिए इनके मन में डर है की कहीं जनता हमारी विरोधी न हो जाए तो यह राजनितिक चाल चलते है ऐसी चाल की हम अपनी मूलभूत समस्या को भूल जाए. और हमारा ध्यान ऐसी बात पर केन्द्रित हो जाए जो हमारे धर्म, जाती, सम्प्रदाय या देश से सम्बन्ध रखती है. अब अगर हमारे देश, धर्म, जाती और सम्प्रदाय का सवाल हो तो हम इनके लिए कोई भी  कुर्बानी देने में पीछे नहीं रहते. जाती धर्म और देश के नाम पर हम फिर से इन्हें अपना सच्चा नेता बना लेते है. लेकिन फिर ये वही राजनीति करते है और वैसे के वैसे ही रह जाते है.

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ताज महल के बारे में आजकल देश के नेता कह रहे हैं की हमारा इतिहास बदल दिया गया है. ताजमहल कभी मंदिर हुआ करता था जिसे मुगलों ने तोड़ कर ताज महल बनाया | देश की जनता भी चाहती है की यह सच सामने आना चाहिए. जब जनता इनसे पूछती है की कैसे इतिहास बदल दिया गया तो इनके पास कोई जवाब नहीं होता. या जवाब भी होता है तो ऐसा भयानक डरावना की हम अपने धर्म के चक्कर में पड़ जाते है. यह लोग उस झूट को चींख चींख कर बोलते है जिससे हमें यकीन होने लगता है की यह सच बोल रहा है.

ताजमहल के बारें में एक अफवाह आम है की ताजमहल बनाने वाले के हाथ काट दिए गए है. यही सबसे बड़ा झूट है. इतिहास की किसी किताब में इस बात का जिक्र नहीं है. यह झूठे नेता कहते है की शाहजहाँ इतना बुरा आदमी था की उसने अपने ही पिता को कैद करवा दिया था. जबकि सच्चाई यह है शाहजहाँ को उसके बेटे ने कैद करवाया था. आजकी तारिख में शाहजहाँ और उसका ताजमहल मशहूर है. उसका बेटा नहीं. अब चूँकि ताजमहल मुसलमानों के द्वारा बनाई गयी ईमारत है और आज पूरी दुनिया में मशहूर है. तो इन्होने राजनीती करने के लिए ताजमहल और उससे जुड़े लोगों को बदनाम करना शुरू कर दिया है. यह नेता देश की आम जनता के मन में ताजमहल और उससे जुडी यादों के बारे में ज़हर घोल रहे है ताकि लोग मुसलमानों से नफरत करने लगे और समाज का एक हिस्सा जो की बहुसंख्यक है वो एक तरफ हो जाए. ताकि वोट लेने में इन नेताओं का फायदा हो सके.

बेशक ताजमहल सदियों से भारत की शान रहा है और आज भी है और रहेगा. इसको बनाने वाला बादशाह भारत की जमीन पर ही जन्मा और इसी जमीन में खाक हो गया और यह तो अन्तराष्ट्रीय मान्यता और कानून है की जो जिस धरती पर पैदा होता है. वह धरती उसकी अपनी मात्रभूमि होती है. उसे उसी धरती के नाम से जाना और पहचाना जाता है. फिर भी यह लोग कहते है की शाहजहाँ भारतीय नहीं था उसके पुरखे विदेश से आये थे. हम इनसे यह पूछना चाहते हैं की विदेश से तो आर्य भी आये, विदेश से तो पारसी भी आये थे. और यह आज भी भारत में रहते है और आप और हम और साड़ी दुनिया इन्हें भारतीय ही कहती है. फिर मुसलमान ही इनकी नज़र में विदेशी क्यूं हैं.

लुटेरे तो अंग्रेज़ थे जो हिन्दुस्तान का सारा धन ले गए, जबकि मुगलों ने अपने वतन और भारत माता के लिए अंग्रेजो से लोहा लिया, जो धन दौलत उनके पास थी वो सब यही है, अगर मुग़ल विदेशी लुटेरे थे तो 4 सदियों से अधिक राज करने के बाद भारत को लूट कर वापिस वही चले जाते जहाँ से वे आये थे. मगर नहीं उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने भारत को ही अपना वतन जाना और यही भारत की मिटटी में खाक हुए.

आजादी से पहले तक हिन्दू मुस्लमान के  बीच कोई खाई नहीं थी. जैसी आज है. यह नेता अंग्रेजों के नक़्शे कदम पर चलकर देश पर राज करना चाहते है. फूट डालो और राज करो, यानी देश की सबसे बड़ी आबादी और उससे छोटी आबादी के बीच के अंतर को इतना बड़ा दो की यह कभी नहीं मिल सकें. और बड़ी आबादी के हिमायती बन कर रहो ताकि बड़ी आबादी इन्हें वोट दे और यह राज करते रहे.

दुनिया के बड़े इतिहास्कारों की राय इन नेताओं से बिलकुल अलग है. सर थॉमस रोए (1581 से 1644) एलिज़बेथान और jacobean का के दौर के एक इंग्लिश डिप्लोमेट थे, वे जब मुग़ल शाशन काल में भारत आये तो उन्होंने भारत के बारें में लिखा की भारत में एक आम भारतीय का जीवन स्तर एक अंग्रेज़ के जीवन स्तर से अच्छा है. यानी मुग़ल शाशन काल में भारत सोने की चिड़िया कहा जाता था. भारत की जनता उस समय खुश थी. और विकास कर रही थी. लेकिन अंग्रेजो की लुटेरी चाहत ने पहले भारत में फूट डाली और भारत को गुलाम बना लिया. सेंकडों सालों तक भारत पर राज किया और लूटते रहे.

गुलामी के दौर में हिन्दू मुस्लमान भारत देश की जनता ही थी. लेकिन आजादी के बाद से हिन्दू मुस्लमान हो गयी. अब तो भारत देश की इतिहासिक इमारतें भी हिन्दू मुस्लमान हो गयी है. मुहब्बत की निशानी ताजमहल जिसे प्यार की निशानी समझा जाता है आज इसे मुसलमान बनाकर पेश किया जा रहा है.

पहले कभी इतिहास बदला नहीं गया लेकिन आज इतिहास को बदला जा रहा है. और ऐसा मन घडत इतिहास आने वाली पीढ़ियों को पढना पड़ेगा जिसमे रत्ती भर भी सच्चाई नहीं. तो क्या हम अपनी आने पीढ़ी पर जुल्म नहीं कर रहे जो उन्हें सच से महरूम रख रहे है. अगर उस वक़्त उन्होंने सच्चा इतिहास पढ़ लिया तो वो हमें कोसेंगे की हमने उन्हें सच से दूर रखा.

Guest Post By

Zaki Ansari

 

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