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Hindu Musalman – भाईचारे की दुश्मन राजनीती

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Hindu Musalman भारत की दो आँखों की तरह है जो एक सकुशल और शाति प्रिय भारत का सपना देखती है, यह वह आँखें है जो हमेशा सपनो के साथ साथ खून के आंसु भी रोती है ! यह जो कुछ देश में होता हुआ देखती है जिससे भारत के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे है ! वज़ह साफ़ है देश में धार्मिक कट्टरता के चलते लोग आपस में लड़ रहे है और देश रो रहा है !

धर्म के नाम पर फैलती नफरत

क्यूं लोग समझते नहीं की न तो इस देश से हिन्दुओ को निकाला जा सकता है और न ही मुसलमान यह देश छोड़ कर कही जाने वाला है , ऐसा सोचना भी मुर्खता का परिचय है, क्योंकि न तो भोगोलिक द्रष्टि से ऐसा संभव है और न ही व्यवहारिक द्रष्टिकोण से ऐसा किया जा सकता है हिन्दू और मुस्लमान दोनों भारत देश की अभिन्न परम्पराएं है, जो सेकड़ों सालोँ से चली आ रही है और इन्हें साथ में रहना ही है ऐसी कोई परिस्थिथि नहीं आ सकती की दोनों अलग हो जाएँ ! फिर क्यूं देश में आपसी भाईचारे की मिठास गायब होती जा रही है, क्यूं कुछ लोग कहते है की हमारा प्यारा भारत देश अब दुनिया की नज़रों में महान जैसा नहीं लगता जैसे आजादी से पहले था, क्यूं हम जब से आजाद हुए तब से अपनों के दुश्मन बन गए जबकि जब हम गुलाम थे तब आपस में मिल जुलकर रहा करते थे और जब आज हम आज़ाद है तो दिलों में नफरत लिए बैठे है, क्या है इसकी वज़ह ?

आइये जानते है क्या यह कारण हो सकते है

राजनीति :

जी हाँ हिन्दू-मुस्लमान के बीच नफरत फ़ैलाने की सबसे बड़ी वज़ह सिर्फ राजनीति ही है, आजादी से पहले हमारा एक लक्ष्य था कि कैसे भी हमें आजादी चाहिए, उसके लिए हमारे बुजुर्गों ने बड़ी कुर्बानियां दी और जब हम इस कगार पर आये की हमें आजादी मिलने वाली है तो हमारे भीतर यह भावना उत्पन्न हो गयी की अब राज कौन करेगा, हम आज़ाद होने वाले थे और राज करने का जो तरीका था वह लोकतान्त्रिक ही होने वाला था पहले की तरह नहीं की कोई राजा अपनी गद्दी छोड़ गया तो उसके उत्तराधिकारी ने उस गद्दी को पा लिया ! अब तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से ही भारत पर राज होने वाला था, और इसके लिए ज़रूरी था की लोकतंत्र की स्थापना हो, लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है की चुनाव कराएं जाए और जिसका बहुमत हो वही सरकार बनाये !

अब सरकार बनाने के लिए वोटों की आवश्यकता भी पड़ी, और यह जुगत भी लगानी पड़ी की कैसे लोगों को अपनी तरफ करके उनसे उनका वोट लिया जाये ! आजादी से पहले ही देश के राजनेताओं ने इसकी ज़रूरत महसूस की और उन्हें लगा की हर व्यक्ति को अपना धर्म सबसे प्यारा लगता है और वोह उसके लिए कुछ भी कर सकता है, तो क्यूं न धर्म और जाती के नाम पर एकजुट होकर सत्ता हासिल की जाए, फिर क्या था धार्मिक आधार पर हम इस चक्रव्यूह में फंस गए और हम अपने ही देश के बटवारे का कारण बने ! जैसा की मैंने इस पोस्ट के शरुआत में लिखा की न तो मुस्लिम को देश से निकलना संभव है और न ही हिन्दुओ का ! ऐसा आजादी के समय हुए बटवारे में भी हुआ, न तो सारे मुसलमान पाकिस्तान जा सके और न है सारे हिन्दू हिन्दुस्तान में रह सके जो लोग बटवारे के खिलाफ थे उन्होंने अपने वतन को ही अपना सब कुछ माना और वहीँ बसे रहे! बड़े बलिदानों के बाद हमने आजादी का सवेरा देखा मगर हम अब भी सत्ता हासिल करने की जुगाड़ में लगे रहे और आपसी दंगों का शिकार हो गए ! यह नफरत आज भी हमारे दिलों में जगह बनाये हुए है और आज भी हम अपने धर्म से अलग दुसरे धर्म को अपनाने में असहज महसूस करते है, यह नफरत शुरु तो वहीँ से हुई मगर कुछ दशकों बाद हमने इस पर काबू पा लिया था और हम फिर से एक साथ रहने लगे ! मगर हमने अपने आप को सुरक्षित बनाये रखने के लिए एक विकल्प बना कर रखा है कि अगर हमारे ऊपर किसी प्रकार की परेशानी आये तो हम किसी एक खास राजनितिक पार्टी को अपना बना लेंगे जो धर्म विशेष के लोगों द्वारा संचालित होती रहे ! बस यही हमारी बड़ी भूल रही की हम विकास को छोड़कर धर्म पर डटे रहे और जो राजनितिक पार्टी हमारे धर्म से सम्बन्ध रखती है उसका सहयोग करते रहे!

धर्म के आधार पर वोट करना

हमने हमारे विकास को धता बताते हुआ धर्म और जाती को सर्व परी रखा और मेरी पार्टी जीतनी चाहिए उसके लिए हिन्दुओ को अलग कर दिया और मुसलमानों को अलग कर दिया, आज भी जब वोट करने का समय आता है तो हम खुद शायद ऐसा पार्टी को वोट देना पसंद करते जो हमारे धर्म से या जाति से सम्बन्ध रखती है, इसी कारण हम एक दुसरे धर्म के लोगो को पसंद नहीं करते, वरना इंसान तो वोह भी है, और इंसान हम भी है, हमारी मूलभूत ज़रूरते वैसी ही है जैसी दुसरे धर्म के व्यक्ति की है, फिर भी हम सत्ता पाने के लिए दुसरे धर्म को सही नहीं ठहराते और जब बात हद पर हो जाती है तो आपस में एक दुसरे के खून के प्यासे हो जाते है !

अपने धर्म को अच्छा और दुसरे के धर्म को बुरा समझना

यह दूसरा कारण है जिसकी वज़ह हमारी नफरतें बरकार है, इस संसार में अलग अलग मान्यताओं के लोग रहते है और उस हिसाब से सभी ने अपना धर्म चुन रखा है, और वह उसी पर अपना जीवन गुजार रहा है या गुजारने वाला है हम किसी भी धर्म के व्यक्ति का धर्म अपने हिसाब से तय नहीं कर सकते और न ही हम उसके साथ ज़बरदस्ती कर सकते है, अगर की भी तो हम मोखिक रूप से भला उसे अपने धर्म में शामिल कर लें किन्तु मानसिक रूप से नहीं, यह अधिकार सिर्फ स्वयं उस व्यक्ति के पास होता है की वह किस धर्म को अपनाना चाहता है, जितना हमें हमारा धर्म प्यारा है उतना ही किसी और को उसका धर्म अच्छा लगता है फिर भी हम चाहते है की वो अपना धर्म छोड़कर हमारे धर्म का पालन करें जो की कतई संभव नहीं है और फिर भी हम इस बात पर लड़ते रहते है !

इस पोस्ट को लिखने का मकसद सिर्फ इतना है की, न तो मुस्लमान को निकाला जा सकता है न ही हिन्दू को तो फिर क्यूं हम एक साथ मिलजुल कर नहीं रहते, लेकिन हमें रहना होगा, वरना आज जो हालात है कल उससे भी बुरे आयेंगे, जिस प्रकार हम हमारे कुछ स्वार्थी बुजुर्गों की फैलाई नफरत को आज तक झेल रहे है, उसी प्रकार हमारी आने वाली पीढ़ी भी, हमारे बुजुर्गों के साथ साथ हमें भी कोसेगी!

आइये आपसी भेदभाव को दूर करिए और एक स्वर्णिम भारत का निर्माण कीजिये

जय हिन्द

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