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Facebook हमारी नयी दुनिया बन गई है

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Facebook हमारी नयी दुनिया
Facebook एक सोशल नेटवर्किंग साइट नहीं है , फेसबुक एक दुनिया है ,एक ऐसी दुनिया जो आप की हमारी एक ऊँगली के इशारे से कुछ एक इंच की स्क्रीन पर चलती है ,यह फेसबुक की दुनिया कभी कभी तो लगता है की हमारी हक़ीक़ी दुनिया से बेहतर है ,यहा आइडियल मोटिवेट ,और नसीहत भरी पोस्ट्स की भरमार होती है ,एक से बढ़ कर एक नसीहत भरी कहानिया और कमाल यह है की यहाँ कोई बुरा नहीं मानता बल्कि उसे लाइक करता है.

हक़ीक़ी दुनिया मैं हम किसी से बोले की अपने मां बाप की सेवा करो तो वोह बोलेगा जा अपनी देख पहले ,यहाँ लोग तारीफों के कमैंट्स करते है ,सुबह 6 बजे खुद जाग कर नमाज़ पढी हो या ना पढी हो , पूजा पाठ किया हो या नहीं लेकिन आँख खुलते ही हम आस्तिक हो जाते है,ऐसा लगता है हम दुनिया के सबसे बडे धार्मिक Facebook यूजर है , और बहुत बढीया बढीया पोस्ट करने लगते है , Facebook की दुनिया हक़ीक़ी दुनिया से बेहतर नज़र आने लगी है ,हक़ीक़ी दुनिया मैं रिश्तो की कोई अहमियत नहीं है, सब एक दूसरे के गले काटने मैं ज्या़िदा मसरूफ है , लेकिन Facebook पर जी भर के, पेट भर के प्यार बरसता है ,

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दुनिया मैं आप कितनी ही शानदार ड्रेस पहन कर जाओ , कोई न कोई धीरे से बोल ही देगा जोकर लग रहा है , Facebook पर आप केसा भी अजीब आँख मुह टेडे मेढे करता फोटो डाल दो आपके फ्रेंड्स दीवाने हो जाते है ,उस वक्त़ दुनिया में आप से ज्या़िदा खूबसूरत इंसान कोई नहीं होता,इतना प्यार इतना प्यार बरसता है की आप को शायद गुमान होने लगे की आप आप ही है ना,इतनी मिठास की डाइबिटीज़ होने का डर होने लगे.शायद इसी लिए हम फेसबुक से बहार निकलना नहीं चाहते ,दिल चाहता है की हर पल यही रहे ,यहाँ वोह सब तारीफ प्यार और रिश्तो की मिठास मिलती है जो हक़ीक़ी दुनिया मे नदारद है ,शायद इसलिए 5-10 मिनट इस दुनिया मे ना आओ तो बेचेनी होने लगती है ,लेकिन गुंडा गर्दी ने अपने पैर यहाँ भी पसार दिए है ,गुंडों और घटिया इंसानो का एक टोला इस दुनिया मे भी बहुत एक्टिव रहता है ,खास कर राजनितिक पार्टियों और काले दिल को खादी मे ढकने वालो के पालतू, पूरे मन के साथ अपना काम करते है. बस एक बेवकूफी इस दुनिया के लोग ज्याि़दा करते है ,
बिना समझे बिना सच जाने जो बात उन तक आती है उसे आगे खिसका देते है ,पता नहीं अपनी बेवकूफी का सबूत देते है या शायद वजह यही है की इस दुनिया मे हम दूसरों पर ज़रूरत से ज्याि़दा भरोसा करते है ,हमें लगता है वोह तो सच का फरिश्ता है झूट बोल ही नहीं सकता, तो हम बिना सच जाने, बिना समझे, पोस्ट आगे खिसका देते है ,हक़ीक़ी दुनिया मे कोई किसी पर इतना भरोसा करता है ?लोग का सोचना गलत है की तीसरा विश्व युद्ध परमाणु हथियारों का होगा ,नहीं भाई वोह फेसबुक और ट्विटर पर लडा़ जायेगा ,गालिया दे दे कर, अपशब्दों के परमाणु बाम गिराए जायेगें ,जो लोग भाग जायेगें Facebook डिलीट कर देगें वोह हारे हुए मान लिए जायेगें।
हमने दुनिया को सुधारने का ठेका लिया हुआ है वोह भी Facebook के ज़रिये ,लेकिन क्या कभी हम आईने के सामने खडे हो कर खुद से पूछते है की मैं केसा हूँ ? मैं क्या हूँ ? कही हम दिखावे की ज़िन्दगी तो नहीं जी रहे ?
अगर हम सब लोग इतने ही शरीफ,इतने ही सीधे, इतने ही दरियादिल और अपनों से इतनी ही मुहब्बत करने वाले है, तो फिर हमारी हक़ीक़ी ज़िन्दगी और दुनिया इतने बुरे हालात मे कैसे है, और क्यों है ?
सवाल का जवाब तलाशिये.शायद गूगल पर मिल जाए।
पढ़ने के लिए शुक्रिया

Zaki Ansari✍?

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