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तीन तलाक का फैसला आने से पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का नया हलफनामा अब क्यूं ?

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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने 18 मई 2017 तक रोज़ सुनवाई पूरी की. 6 दिनों यह सुनवाई जब पूरी हो गयी तो सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है. कोई भी फैसला आने से पहले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अब एक नया हलफनामा पेश किया है. जिसमे तीन तलाक को लेकर मुसलमानों में नए दिशा निर्देश ज़ारी करने की बात की गयी है. पर्सनल लॉ बोर्ड का यह नया हलफनामा अब क्यूं आया यही सवाल उठता है. केस की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ये कहता रहा की वो शरियत में किसी भी तरह की दखल अन्दाजी को बर्दाश्त नहीं कर सकता है. और जिस प्रकार अब तक हिन्दुस्तान में तलाक दिया जाता रहा है. उसका समर्थन करता रहा है. यहाँ तक की whatsapp, और फ़ोन पर दिए गए तलाक के भी पक्ष में था. फिर अचनाक क्या हुआ की तीन तलाक पर शरियत में नए दिशा निर्देश ज़ारी करने और लोगों को उसके बारे में अवगत कराने की बात मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड करने लगा है.

जब शरियत में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता था तो अब नए दिशा निर्देश कैसे उत्पन्न हो गए. ज़ाहिर सी बात है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को लगता है की सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके खिलाफ जाने वाला है. और सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले से शरियत को प्रभावित करें उससे पहले ही. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी गलती सुधार करते हुए तलाक और निकाह के नए दिशा निर्देश ज़ारी कर रहा है. जो साफ यह दर्शाता है की जिस प्रकार भारत में मुस्लिम समाज में तलाक दिया जाता रहा है वोह गलत था. किन्तु मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस और कभी ध्यान नहीं दिया. और गलत तलाक होते रहे.

किन्तु आज 23 मई को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नया हलफ़नाम सुप्रीम कोर्ट में पेश किया है. जिसमे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है की “तलाक़ को लेकर शरीयत का रुख़ एकदम साफ़ है. बिना किसी कारण तलाक़ देना और तीन बार तलाक़ बोलना तलाक़ देने का सही तरीक़ा नहीं है. इस तरह की प्रथा की शरीयत में घोर निंदा की गई है. इसके लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक बड़ा सार्वजनिक आंदोलन शुरू करेगा.”

नए हलफनामे में यह भी कहा गया की “मुसलमानों के सभी तबकों ख़ासतौर से ग़रीब लोगों के बीच इस बारे में जागरूकता लाई जाएगी और मस्जिदों के इमामों और वार्ताकारों से इस मामले में मदद के लिए कहा जाएगा.”

निकाह होते वक़्त ही दूल्हा दुल्हन को यदि ज़रूरी है तो शरियत के अनुसार तलाक के बारे में जानकारी दी जाएगी. ताकि भविष्य में अचानक तीन तलाक से मुसलमानों का वैवाहिक जीवन प्रभावित न हो.

अपने लेख के माध्यम से में यही कहना चाहूँगा की “जो पहल मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने आज की है यदि वह पहले कर लेता तो तलाक का मुद्दा सुप्रीमे कोर्ट में नहीं पहूचता और मुसलमानों की बदनामी नहीं होती. तीन तलाक पर बोर्ड मूकबधिर बैठा रहा और अप्रसांगिक तलाक होते रहे. चूंकि तलाक के मामलों में शरियत को सही प्रकार से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था.

जहाँ तक मुझे तीन तलाक का ज्ञान है और मैंने स्वयम भी इस मामले को जाना है उसके अनुसार तलाक इस्लाम में एक ऐसी बेहतरीन व्यवस्था है जो दुसरे किसी और धर्म में नहीं है. हाँ कुछ धर्मो ने अब इसका पालन किया है. किन्तु उसमे अभी भी बहूत सी सामाजिक बुराइयाँ मौजूद है. 

मुसलमानों में तलाक एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे मानव अधिकारों का उलंघन नहीं होता है. आप भी सोच रहे होंगे की ऐसा क्यूं कहा है. आइये मुसलमानों में तलाक पर हम छोटा सा एक विश्लेषण करते है.

यूं तो कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में  तलाक को अच्छी बात नहीं मानता और कुरान में भी इसे सही नहीं बताया गया. कहा गया की यह बुरी बात है. इससे बचना चाहिए. जहाँ तक हो सके पति पत्नी में आपसी संबंधों को मधुर बनाये रखना चाहिए और प्रेम से एक साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए. पति को पत्नी का और पत्नी को पति का ख़याल रखना चाहिए.

मगर क्या किया जाए यदि पति और पत्नी के बीच आपसी सामंजस्य न हो. आपसी प्रेम न हो, जब पति और पति दोनों के विचार आपस में मेल न खाते हों. जब पति अपनी पत्नी की तरफ और पत्नी अपने पति की तरफ देखना भी पसंद न करें. जब आपस में दोनों का साथ रहना दूभर हो जाये. और दोनों एक दुसरे के साथ न रहना चाहते हो…… तो शरियत में तलाक और खुला का रास्ता बताया गया है 

कैसे होना चाहिए तलाक ?

जहाँ तक  मुझे ज्ञान है और मैंने इस्लाम और शरियत का जाना हैं. उसके अनुसार कभी भी तीन तलाक एक साथ  में नहीं देना चाहिए. शरियत में राज़ी ख़ुशी से तलाक होने की शर्त यह है की आप औरत का सम्मान करो, यदि आप उसके साथ इन्साफ नहीं कर सकते, या आप उसे उसके अधिकार नहीं दे सकते, यदि आप अपनी पत्नी की खुशियों का ख्याल नहीं रख सकते या औरत खुद तुम्हारे साथ अपना जीवन नहीं बिताना चाहती या वोह किसी और के साथ अपना जीवन बिताना चाहती है  तो बेशक उससे अलग हो जाओ. ताकि आप अपना जीवन अपने हिसाब से और औरत अपना जीवन उसके  हिसाब से जी सके. किन्तु एक साथ तीन तलाक नहीं देना चाहिए क्यूंकि एक साथ तीन तलाक दे देने से तुम्हारे बीच अब सुलह और राजीनामे के सारे रस्ते बंद हो जाते है अब तो तलाक मुकम्मल हो जाता  है अक्सर देखा गया है की तलाक के मामले गुस्से में ज्यादा होतें है. और पति एक साथ तीनो तलाक दे देता है और फिर अपनी गलती पर पछताता है बहूत से विद्वानों के अनुसार तलाक को तीन अलग अलग टाइम में दिया जाना चाहिए यानी पहले एक बार  फिर कुछ दिनों बाद (नोट : यहाँ अलग अलग फिरकों के लोग अलग समय बताते है ) कभी भी तलाक को औरत  के माहवारी के समय नहीं दिया जान चाहिए  और न  ही ऐसे समय में जब उसके पेट में आपका बच्चा हो, यानी औरत पूरी तरह से पाक साफ़ होना चाहिए !

यदि तुम उसे पहली तलाक  दे चुके हो तो अब तुम्हारा उस पर कोई हक नहीं. यानी तुम उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना सकते. लेकिन तुम्हारी पत्नी का हक अब भी आपके घर में रहता है. उसका खाना पीना और ज़रूरत का सामान लाकर देना इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी है. चाहे तुम खुद करो या किसी और से करवाओ. यदि इस साथ रहने के दौरान आपमें वापिस सुलह हो जाये.तो आप वापिस से निकाह कर सकते है. यदि सुलह न हो तो दूसरी तलाक दी जा सकती है. अब माता पिता और रिश्तेदारों को हस्तक्षेप करना लाज़मी हो जाता है. उन्हें चाहिए की पति पत्नी को जो सम्बन्ध टूट रहा है उसे बचाने के लिए दोनों से बात करें और उन्हें वापिस एक होने की सलाह दें. यदि फिर भी सुलह न हो तो अब तीसरी तलाक दी जा सकती है. 

तलाक हो जाने के बाद जो तुमने अपनी पत्नी को दिया है चाहे वोह कोई तोहफा हो या कोई ज़मीन जायदाद यो कोई कीमती सामान तुम उसे वापिस नहीं ले सकते, अब वह औरत का ही है. बल्कि अगर तुम पर उसका कुछ बाकी रह गया है तो तुम्हे उसे लोटना होगा.

तीन तलाक  हो जाने के बाद अब कोई सुलह की सम्भावना नहीं अब तलाक  मुकम्मल हो गया. अब पत्नी को इद्दत का समय पूरा होते ही  अलग होना होगा.  तलाक मुकम्मल हो जाने के बाद औरत और मर्द पूरी तरह से आज़ाद है. किसी पर किसी का कोई हक नहीं रहता. जिससे दोनों अपना जीवन अपने हिसाब से जी सकते है. दोनों को आजादी है की वोह अपना निकाह किसी और से कर सकते है. यदि वोह चाहे तो. शरियत में इस बात की कोई पाबन्दी नहीं है की यदि कोई औरत तलाकशुदा है तो वह अन्य कोई विवाह नहीं कर सकती. औरत जिसके साथ राजी हो उससे निकाह कर सकती है. मर्द भी जिससे चाहे जिसे पसंद करे निकाह कर सकता है.

तलाक के बाद भी ऐसी आजादी दुसरे धर्मों में कम देखने को मिलती है. भारत में तो और बुरा हाल है. यहाँ यदि कोई तलाक होता है. तो पहले तो उसके बाद भी दोनों खुश नहीं रह सकते है. औरत को मनहूस समझा जाता है. उसका सामाजिक बहिष्कार जैसा हो जाता है. समाज में उसके अधिकारों का हनन किया जाता है. उसको वह सम्मान नहीं दिया जाता जो एक औरत को मिलना चाहिए |

मुसलमानों को छोड़ कर अन्य धर्मो में महिलाएं दूसरी शादी नहीं करती. उसका कारण यही है की उसे बुरा समझा जाता है. चाहे इस तलाक में उसकी कोई गलती हो या न हो किन्तु हमारा समाज उसे सम्मान की नज़र से नहीं देखता. अपितु उसका फ़ायदा उठाना चाहता है.

ठीक इसी प्रकार मर्द पर भी कई भार दाल दिए जाते है. यदि वह किसी औरत को तलाक देता है तो उसपर जीवन भर या कुछ समय के लिए उसकी तलाकशुदा पत्नी के भरण पोषण का बोझ डाल दिया जाता है.  फिर चाहे वोह इसके लिए सक्षम हो या न हो. कोट कचहरी में लाखों रूपए लग जाते है. कई बार तो सजा का भी प्रावधान है.

मुसलमानों की अपेक्षा अन्य धर्मो में तलाक के बाद के  बोझ से बचने के लिए कुछ लालची लोग अपनी पत्नियों को मारने तक का षड़यंत्र रच डालते है. और मार भी देते है. कभी जलाकर तो कभी और अन्य तरीकों से जिनसे उनकी पकड़ भी न हो. किसी दूसरी माता पिता की बेटी को षड्यंत्र रच कर मार डालना तलाक देने से भी बड़ा पाप हो जाता है.

दहेज़ प्रथा एक सामाजिक बुराई है. यह सभी धर्म के लोग मानते है. किन्तु हिन्दुओं में यह प्रथा घटने की बजाय विकराल रूप लेती जा रही. लोग  आधुनिक तो हो रहे है किन्तु अपने बेटे को बेचना बंद नहीं कर रहे है, बेटे को दहेज़ के लिए ऐसे तैयार किया जाता है जैसे बलि के लिए बकरे को. माता पिता बेटे के परविश करते वक़्त इस बात का ध्यान रखते है की इस पर जो कुछ खर्च हो रहा है. वोह सब इसके विवाह के समय वापिस निकाल लेंगे. आजकल माध्यम वर्ग के परिवार की कोई भी शादी 20 लाख रूपए से कम में नहीं निपट सकती. ऊपर से शादी के बाद गिफ्ट्स की मांग अलग से हो जाती है. यदि कोई औरत अपने साथ अच्छा दहेज़ नहीं लाइ या जो बेटे वाले ने माँगा वोह उसे नहीं मिला तो उस विवाह के टूटने का खतरा सर्वाधिक हो जाता है.

जबकि मुसलमानों की शरियत में इस प्रकार के दहेज़ का धार्मिक बहिस्कार है. कोई बेटे वाला बेटीवाले से दहेज़ की मांग नहीं कर सकता हाँ कुछ अपवाद अवश्य है. दहेज़ की मांग करने वाले logon को मुसलमानों में बुरा समझा जाता है. उनका सामाजिक बहिष्कार भी किया जाता है. किन्तु यदि कोई पिता अपनी बेटी का हक उसे देना चाहता है तो वो उसे दे सकता है. उपहार स्वरुप कोई भी पिता अपनी स्वेच्छा से कुछ भी दे तो भी कोई बुरी बात नहीं. यदि बेटी बाप के माल से अपना हक चाहे तो उसे अधिकार है तो किसी भी समय अपना हक ले सकती है.

बड़ा सवाल यही है की तलाक के मामलों को सामाजिक तोर पर कम किया जाना चाहिए चाहे वोह किसी भी धर्म के हों. किन्तु इसपर पूरी तरह रोक लगा देना या तलाक को किसी भी प्रकार की शर्तों के मुताबिक करना गलत होगा.  क्यूंकि यह पूरी तरह से मानवाधिकारों का उलंघन होगा

जब तीन तलाक का  मुद्दा देश की सर्वोच्च  अदालत में जा चूका है तो निसंदेह निर्णय अच्छा ही आयेगा. एक साथ दी गयी तलाक पर रोक होनी चाहिए. इसे शरियत के मुताबिक़ दिया जाना चाहिए.  क्यूंकि शरियत में किसी भी प्रकार से कोई कमी नहीं, कमी है तो हमारे आज के जीवन परिवेश और समाज में जो तीन तलाक को अशिक्षा के कारण समझ नहीं पाया और उसका गलत इस्तेमाल करने लगा.

उपरोक्त लेख में कुछ विचार मेरे अपने है. आप भी अपने विचार निचे कमेंट्स बॉक्स में लिख सकते है. 

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